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कोलेबिरा से क्या लिखी जायेगी महागठबंधन के बिखराव की कहानी !

N7News Admin 07-12-2018 08:42 PM विशेष ख़बर




रांची।

झारखण्ड की सियासत में कोलेबिरा उपचुनाव ने महागठबंधन में बिखराव की कहानी का आगाज कर दिया हैं. जेएमएम ने महागठबंधन को बिना भरोसे में लिए झारखण्ड पार्टी की मेनन एक्का को समर्थन की घोषणा कर सूबे के सियासी गलियारों में भूचाल सा ला दिया हैं. वही दूसरी तरफ बीजेपी जिसकी इस सीट पर आजादी के बाद से ही नजर हैं, उसके लिए ये सीट डैमेज कण्ट्रोल का काम करने वाली हैं.

कोलेबिरा सीट पर आजादी के बाद से अब तक का हाल: 

सिमडेगा जिले का कोलेबिरा विधानसभा सीट आदिवासी बहुल क्षेत्र हैं. इस सीट पर आजादी के बाद से कई दशक तक झारखण्ड पार्टी का कब्ज़ा रहा हैं. इस सीट पर बीजेपी की नजर तो हैं मगर आजादी के बाद से ही उसे कोलिबिरा सीट पर हार ही मिली हैं. 1952 से 77 तक इस सीट पर झारखण्ड पार्टी का वर्चस्व रहा. 1980 में पार्टी के सर्वेसर्वा रहे सुशिल पागे ने कांग्रेस की टिकट पर जीत हासिल की, मगर 84 में उनकी मृत्यु के बाद 1985 में ये सीट फिर एक बार झारखण्ड पार्टी के कब्जे में आ गयी. एनी होरो ने जीत का परचम लहराया. 1990 में कांग्रेस की जीत हुई फिर 95 और 2000 में कोलेबिरा में जेएमएम का दबदबा बढ़ने लगा, बसन्त कुमार ने जीत हासिल कर झारखण्ड पार्टी की इस सीट को उसके कब्जे से छुड़ा लिया था. मगर झारखण्ड अलग राज्य के बाद से सिमडेगा जिले का कोलेबिरा सीट पर मानो झारखण्ड पार्टी के एनोस एक्का ने अपने नाम की मुहर लगा दी. 2014 में भी इस सीट को एनोस ने तमाम भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच भी अपने ही कब्जे में कर रखी थी. मगर पारा शिक्षक हत्या कांड में फसे एनोस की सदस्यता खत्म होने के बाद इस सीट पर चुनाव हो रहे हैं और इस बार उनकी पत्नी मेनन एक्का चुनावी मैदान में जीत का दम भर रही हैं. जिन्हें जेएमएम का समर्थन मिल चूका हैं मगर बीजेपी की माने तो वो अब आजादी के बाद से अपने इन्तजार को ख़त्म करने के मूड में हैं. बीजेपी ने इस सीट पर क्रिश्चन उम्मीदवार को खड़ा कर CHRISTIAN MISSIONARY के खिलाफ की जा रही कार्रवाई का डैमेज कण्ट्रोल करने का दाव खेला हैं.

क्या ये हैं जेएमएम की रणनीति ?

कोलेबिरा सीट पर एनोस एक्का की पत्नी मेनन एक्का को समर्थन देकर जेएमएम ने महागठबंधन के भविष्य पर एक सवाल खड़ा कर दिया हैं. सवाल ये हैं कि जब महागठबंधन ने झारखण्ड में हुए उपचुनाव में एक उपचुनाव छोड़ सभी को जीता हैं तो फिर क्या जरुरत पडी इस चुनाव में अकेले निर्णय लेने की? तो इसकी एक खास वजह हैं , सिमडेगा जिले की दोनों विधानसभा सीट पर झारखण्ड पार्टी या यूँ कहे एनोस एक्का का वर्चस्व हैं. कोलेबिरा सीट से लगातर तीन बार चुनाव जीत कर एनोस एक्का विधानसभा पहुंचे थे. वही सिमडेगा सीट पर 14 में हुए चुनाव में एनोस की पत्नी ने बीजेपी की विमला प्रधान को कड़ी टक्कर दी थी और महज 3,194 वोट से हारी थी. मतलब साफ़ हैं जेएमएम मेनन एक्का को आगे कर सिमडेगा और कोलिबेरा दोनों सीट पर खुद को मजबूत करना चाहती हैं. जिसका फायदा उसे लोकसभा चुनाव में मिलेगा. खूंटी लोकसभा क्षेत्र में 6 विधानसभा सीट हैं जिसमे खूंटी और सिमडेगा बीजेपी के कब्जे में हैं ऐसे में जेएमएम का ये फैसला एक सोची समझी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा हैं. अब बात कांग्रेस सहित तमाम महागठबंधन की, तो कांग्रेस ने भी इस सीट पर उम्मीदवार देकर जेएमएम को शायद ये बताया हैं कि वो भी राजनीतिक दाव-पेच दिखा सकती हैं. 

छा गया महागठबंधन पर कोहरा: 

जेएमएम ने झारखण्ड पार्टी की मेनन एक्का को समर्थन की घोषणा कर एक तीर से दो निशाना साधा हैं. तो वही जेएमएम के खिलाफ महागठबंधन ही नहीं अपने लोग भी खड़े हो रहे हैं. तोरपा विधानसभा सीट से जेएमएम विधायक पौलुस सुरीन ने भी मेनन को टिकट दिया जाने का विरोध किया हैं. तो वही जेएमएम ने इस विरोध की वजह से सिमडेगा जिले से 18 कर्येकर्ता को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया हैं. बहरहाल, जेएमएम के इस फैसले ने महागठबंधन की एकता पर धुंध ला दिया हैं.  





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