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मधुपुर के कुदरती दृश्यों और आबोहवा के मुरीद थे गांधीजी

N7News Admin 02-10-2019 05:11 PM विशेष ख़बर



उत्तम पियूष   Written by: डॉ. उत्तम पीयूष

मधुपुर/देवघर।

मधुपुर जो कभी प्राकृतिक सौंदर्य , कुदरती दृश्यों और आबोहवा के लिए मशहूर हुआ करता था.

1925 में महात्मा गांधी जब मधुपुर आए और उन्होंने मधुपुर की नगरपालिका का उद्घाटन किया तो उन्होंने मधुपुर की नैसर्गिकता का जिक्र भी किया, जिसके कारण मधुपुर मशहूर हो चुका था।
वर्ष 871 से कोलकाता-दिल्ली वाया पटना मधुपुर विकसित होते रेल यातायात ने एक शहरी तमीज देनी शुरू कर दी और देखते ही देखते बंगाल के जेंटिलमैन (भोद्रोजोन) यहां के सुपाच्य और मीठे जल के मुरीद हो गए ।साथ ही उन्हें यहां की आबोहवा भी खूब रास आ गई और यह कस्बेनुमा शहर अंग्रेजों और बंगाली रईसों का एक अनकहा उपनिवेश जैसा बन गया ।

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परंतु महात्मा गांधी ने स्थानीय निकाय को मधुपुर की जनाकांक्षाओं से जोड़कर देखा । उन्होंने अनुभव कर लिया कि मधुपुर नगरपालिका की आमदनी बहुत ही थोड़ी होते हुए भी उन्हें अपनी-अपनी हद में आने वाले क्षेत्र को साफ-सुथरा और रोग मुक्त रखने में मुश्किलों का सामना नहीं करना पड़ेगा।

जाहिर है कि गांधीजी नागरिक व्यवस्था की सुव्यवस्था को न केवल समझते थे बल्कि उसे किस प्रकार मेंटेन किया जाए, कैसे स्वच्छता और साफ-सफाई को अहमियत दी जाए और कैसे बीमारी एवं रोगों से मुक्त रहने के उपाय किए जाए - यह उन्होंने मधुपुर में व्यक्त किया।

एक जमाने में प्रख्यात शायर अख्तर मधुपुरी ने भी मधुपुर के हुस्न पर रीझ कर कुछ यूं कहा था कि -

"चमन जा रे गुली लाला यहां है
नये रंगी का मधुशाला यहां है
जमीं के चांद का हाला यहां है
मकाम-ए-जलवा हाय हूर है यह
हमारा शहर मधुपुर है यह "

वक्त बदला हम बदले और यह शहर भी बदल गया। फूलों , खूबसूरत दृश्यों और इत्मीनान वाले शहर में बढ़ती जनसंख्या , तंग होती सड़के , पॉलिथीन और कचरों से भरी नालियों और मुख्य सड़कों पर ट्रैफिक जाम ने इस शहर की जैसे पहचान ही खो दी है । बचे कूचे जो प्राकृतिक दृश्य और धरोहर हैं, उन्हें भी कहीं जंगलों में गछकटवे पेड़ काट रहे हैं , तो कहीं पहाड़ों-झरनों के पत्थर पत्थरों के लुटेरे लूट रहे हैं। गर्मियों में जमीन के नीचे पानी खिसक कर पाताल में चला जाता है और लगभग सारे वन-उपवन ,बाग-बगीचे या तो उजड़ चुके हैं या उजड़ने की कगार पर है । अब "सोनार बांग्ला", ' मातृका' जैसी कोठिया वह रौनक नहीं पैदा करती जिनके लिए यह कल तक जानी जाती थी ।

डॉक्यूमेंट
1925 में महात्मा गांधी के मधुपुर आगमन पर यहां की नैसर्गिकता, प्राकृति सौंदर्य और आबोहवा पर दिए उनके संदेश का महत्व और बढ़ गया है , जब मधुपुर की खूबसूरती घटती जा रही है और पहले से ज्यादा बेरौनक होता जा रहा है यह शहर।

@लेखक साहित्यकार एवं शोध अध्येता हैं। 




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