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दिलचस्प रहा है जरमुंडी विधानसभा का इतिहास,बाहरी प्रत्याशी यहां की जनता की नहीं हैं पहली पसंद

N7News Admin 23-11-2019 03:23 AM विशेष ख़बर



By:N7India.Com (Desk )

जरमुंडी।

दुमका और देवघर जिले के तीन प्रखंडों (देवघर-सारवां,सोनारायठाढ़ी और दुमका-जरमुंडी) से जुड़कर बना जरमुंडी विधानसभा में इसबार का चुनाव बड़ा ही दिलचस्प होने जा रहा है. लेकिन, मजेदार बात ये है कि इस विधानसभा में हमेशा से ही मुकाबला दिलचस्प ही रहा है. दो जिलों के तीन प्रखंडों में बसने वाली जरमुंडी विधानसभा की जनता इस बार किसे सर आंखों पर बैठाती है, इसका फैसला तो 23 दिसंबर को आयेगा. 

लेकिन, इस विधानसभा का इतिहास रहा है कि यहां की जनता किसी बाहरी प्रत्याशियों को तवज्जो नहीं देती. यही वजह है कि अबतक हुए चुनाव में एक बार को अगर छोड़ दें तो 11 बार स्थानीय प्रत्याशियों को ही जनता ने अपना समर्थन दिया है. 

अबतक हुए 12 चुनाव में 11 बार जरमुंडी विधानसभा से स्थानीय उम्मीदवार ही जीत दर्ज कर पायें हैं. सिर्फ, एक बार साल 1967 में सनथ राउत, जो दुमका निवासी रहते चुनाव जीते थे, वो भी सिर्फ दो साल के लिए. यानि 1967 से 1969 तक ही ये यहां के विधायक रहे. 

जरमुंडी विधानसभा से विधायकों के इतिहास की बात करें तो यहां की जनता ने कभी जरमुंडी तो कभी सारवां और कभी सोनारायठाढ़ी से आये उम्मीदवार को तरजीह दी. जिसमें सबसे ज्यादा मौका जरमुंडी प्रखंड के प्रत्याशियों को मिला. इस इलाके से श्रीकांत झा ने तीन बार जीत दर्ज की. 

साल 1962 में श्रीकांत झा, कांग्रेस से जीते
साल 1969 में श्रीकांत झा, फिर कांग्रेस से जीते 
और, 1972 में भी कांग्रेस श्रीकांत झा को ही जनता ने अपना समर्थन दिया. 

साल 1967 में दुमका के रहने वाले जेपी के सनथ राउत ने श्रीकांत झा को हरा जीत दर्ज की थी, लेकिन वो दो साल ही विधायक रहे. 

वर्ष 1977 में नोनीहाट के हंडवा इस्टेट के दीपनाथ राय, निर्दलीय को जनता ने अपना समर्थन दिया था, जिन्होंने अभयकांत प्रसाद को हरा जीत दर्ज की थी. और एक बार ही विधायक चुने गये, वो भी सिर्फ तीन साल के लिए. 

साल 1980 में सारवां के जवाहर प्रसाद सिंह, निर्दलीय ने दीपनाथ राय को हरा जीत हासिल की थी, और 1990 में भी जवाहर प्रसाद सिंह को ही यहां की जनता ने चुना था. 

साल 1985 में अभयकांत प्रसाद, भाजपा को जनता ने अपना समर्थन दिया था. 

साल 1995 और 2000 में देवेंद्र कुंवर को जनता ने सर आंखों पर बिठाया. एक बार देवेंद्र कुंवर झामुमो तो दूसरी बार भाजपा से चुनाव लड़े थे. हालांकि, इस बार भी भाजपा ने देवेंद्र कुंवर को टिकट देकर अपना दांव खेला है. देवेंद्र कुंवर नोनीहाट के रहने वाले हैं. 

साल 2005 और 2009 में जनता ने सोनारायठाढ़ी के हरिनारायण राय को मौका दिया. जिन्होंने दोनों बार निर्दलीय चुनाव लड़ा. 

साल 2014 में जरमुंडी की जनता ने कांग्रेस प्रत्याशी बादल पत्रलेख को चुना, जो सारवां के रहने वाले हैं. इस बार भी कांग्रेस ने बादल को ही चुनावी मैदान में उतारा है. 

वहीं, साल 2019 के चुनावी दंगल में कई दलों के प्रत्याशी और निर्दलीय अपनी किस्मत आजमा रहे हैं, जिसमें कई जरमुंडी विधानसभा के बाहर से भी हैं. जिसमें सीटिंग विधायक कांग्रेस के बादल पत्रलेख के अलावे भाजपा के देवेंद्र कुंवर, लोजपा से वीरेंद्र प्रधान, जेवीएम से डाॅ0 संजय की उम्मीदवारी के अलावा भाजपा से बागी होकर सीताराम पाठक भी चुनावी मैदान में ताल ठोक रहे हैं. इसके अलावे भी कई और नाम जो किसी न किसी दल से या निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर सामने आ सकते हैं. 

अब देखना दिलचस्प होगा कि सबकी अपनी-अपनी तैयारी और जीत के दावों के बीच यहां की जनता किसे अपने सर आंखों पर बिठाती है. इस पर अंतिम रूप से मुहर 23 दिसंबर को मतगणना के दिन ही लग पायेगा. 





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