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सरकार की नज़रें हो जाये इनायत तो बदल जायेगी नंदन कानन की तस्वीर

N7News Admin 12-09-2017 06:31 PM विशेष ख़बर

नंदन कानन




जामताड़ाः- (गौतम मंडल)

महान समाज सुधारक और प्रकांड विद्वान पंडित ईश्वरचंद्र विद्यासागर की कर्म भूमि करमाटांड स्थित आवास आज भी सूनसान पड़ा है. नंदन कानन को करमाटांड प्रखंड के लोग मलिया बगान के नाम से जानते है. मलिया बगान नाम से चर्चित उनका आवास देखने के लिए सलाना सैकड़ों पर्यटक यहां पहुंचते हैं. हालांकि सुविधा व संसाधन के अभाव में पर्यटकों की संख्या में बढ़ोतरी नहीं हो पा रही है. इस ऐतिहासिक स्थल को विकसित करने की जरूरत है.

( नंदन कानन की आज की स्थिति पर एक नज़र )

गेस्टहाउस है, लेकिन सुविधा की कमी :-
नंदन कानन में अतिथियों के लिए गेस्टहाउस तो है. जो आठ साल पहले बना है. जहां कुल छह कमरे है. लेकिन ऊपरी मंजिल का एक कमरा अबतक अधुरा है. यहां पर्यटकों के लिए तीन कमरे हैं. सोने के लिए चैकी है. पलंग का अभाव है. बिजली की आंख-मिचैली लगी रहती है.  जेनरेटर नही है. ऐसे में काफी परेशानी होती है.

गेस्ट                                                                                                                               गेस्ट हाउस

बंद पड़ा ऐतिहासिक विद्यालयः-
नंदन कानन परिसर में सन् 1976 में विद्यासागर बालिका मध्य विद्यालय की शुरुआत हुई. जहां सैकड़ों की संख्या में बच्चे पढ़ते थे. पिछले आठ साल से विद्यालय बंद हो गया है. लिहाजा बच्चों से गुलजार रहने वाला विद्यालय आज वीरान है. विद्यालय विद्यासागर स्मृति रक्षा समिति करमाटांड द्वारा निःशुल्क चलाया जा रहा था. अर्थाभाव के कारण विद्यालय बंद हो गया.

स्चोल्ल                                                                                                                                 विद्यालय

किया जा रहा है सौंदर्यीकरणः- 
पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए प्रशासन द्वारा नंदन कानन का सौंदर्यीकरण कार्य कराया जा रहा है. इसमें भवन मरम्मति, सड़क निर्माण, तोरण द्वार आदि कार्य लगभग 22 लाख की लागत से हो रहे हैं. पहली बार यहां कुछ काम हो रहा है. लेकिन सौंदर्यीकरण कार्य में गड़बड़ी साफ दिखाई देती है. 

कहां-कहां से आते है लोगः- 
नंदन कानन में विद्यासागर की स्मृति को देखने बिहार, बंगाल व झारखण्ड के विभिन्न हिस्सों से सालों भर लोग आते-जाते हैं. यहां वह पलंग जिसमे विद्यासागर जी सोते थे आज भी मौजूद है,जिसे लोग देखना नहीं भूलते. इसके अलावे उनके कमरों व परिसर में पर्यटक प्रतिमा का दर्शन करते हैं.

पलंग                                                                                                                                स्मृति शेष

करमाटांड स्टेशन से जुड़ी हैं यादेंः-
पंडित ईश्वरचंद्र विद्यासागर की कर्म भूमि करमाटांड है. इनके नाम से ही करमाटांड रेल स्टेशन का नाम विद्यासागर स्टेशन के नाम से जाना जाता है. नंदन कानन घुमने आने वाले लोग जब भी विद्यासागर स्टेशन पर उतरते हैं. सबसे पहले इस पवित्र भूमि को नमन करते हैं. स्थानीय लोग बताते है कि यह सिलसिला काफी पहले से ही चला आ रहा है. करमाटांड के लोग विद्यासागर की कर्मभूमि में रहने को लेकर गर्व महसूस करते हैं. 

स्टेशन                                                                                                                                 स्टेशन

स्टेशन में प्रतिमा नहींः- 
करमाटांड निवासी परेश दत्ता और सत्यनारायण साह ने कहा कि पंडित ईश्वरचंद्र विद्यासागर की स्मृति में रेल स्टेशन का नाम विद्यासागर स्टेशन रखा तो गया. लेकिन विद्यासागर की एक अदद प्रतिमा तक नहीं स्थापित की गई. जो भी पर्यटक यहां स्टेशन पर उतरते हैं. पहले धरती को छूकर प्रणाम करते है. ऐसे में यदि झारखंड सरकार व रेल मंत्रालय स्टेशन कैंपस में विद्यासागर जी की प्रतिमा स्थापित कर दे तो आगंतुक भी गदगद होंगे. दोनों ने कहा कि यूं तो स्टेशन में उनकी फोटो है लेकिन जरूरत प्रतिमा की भी है. इस ओर पहल की आवश्यकता है.

ये हुआ तो बहुरेंगे नंदन कानन के दिन, मिलेगी राजस्व भीः-
नंदन कानन परिसर को यदि सरकार संवार दे तो पर्यटन उद्योग को भी बढ़ावा मिलेगा. राजस्व की प्राप्ति होगी और करमाटांड ज्यादा चर्चित होगा. विद्यासागर स्मृति रक्षा समिति सचिव देवाशीष मिश्रा की मानें तो नंदन कानन में अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन की संभावना है. पंडित ईश्वरचंद्र विद्यसागर विश्व विख्यात हैं. यदि मैथन-विद्यासागर, नंदन कानन-पथरौल-देवघर को टूरिस्ट सर्किट से जोड़ा जाए तो काफी संख्या में पर्यटक आयेंगे. साथ ही करमाटांड की पुरानी कोठियो को हेरिटेज टूरिज्म के रूप में विकसित किया जाना चाहिए. नंदन कानन में हायर लेवल का स्टडी सेंटर खोला जाये. 

परिसर                                                                                                                             खाली पड़ा परिसर

नंनद कानन के लोगों की मांगः-
शकील अहमद ने कहा कि नंदन कानन परिसर काफी बड़ा है. वहां मनोरंजन के लिए पार्क बनना चाहिए. पार्क बन जाने से पर्यटकों के साथ-साथ स्थानीय लोगों और बच्चांे से पार्क गुलजार रहेगा. साथ ही राजस्व भी मिलेगा.
विमल जायसवाल ने कहा कि नंदन कानन में स्ट्रीट लाइटें लगनी चाहिए. डीप बोरिंग के साथ-साथ बागबानी भी समय की मांग है.
फोदी रजक ने कहा कि विद्यासागर स्टेशन पर नंदन कानन सूचना केंद्र खुलना चाहिए. 
परेश दत्ता कहते हैं कि नंदन कानन परिसर में मैरिज हाॅल बनना चाहिए. यहां के लोग जामताड़ा मधुपुर व देवघर मैरेज हाॅल जाते हैं. यदि परिसर में मैरेज हाॅल बना दिया जाए तो समिति को पैसा भी मिलेगा जिससे नंदन कानन का मैनेजमेंट में आर्थिक बाध्यता नहीं आएगी.
धनेश्वर यादव ने कहा कि बंद पड़े विद्यासागर बालिका मध्य विद्यालय को सरकार अपने स्तर से चलाएं ताकि विद्यालय का अस्तित्व बचा रह सके.
केयरटेकर जितेन्द्र प्रसाद मंडल ने कहा कि जेनरेटर के साथ साथ सामुदायिक शौचालय की जरूरत है.

पेड़                                                                                                                                 ईश्वरचंद्र द्वारा लगाया गया पेड़ 

विद्यासागर एक परिचयः-
ईश्वर चन्द्र विद्यासागर के बचपन का नाम ईश्वरचंद्र चट्टोपाध्याय था. वे बंगाल पुनर्जागरण के स्तम्भों में से एक थे. इनका जन्म पश्चिम बंगाल में हुआ था, करमाटांड़ इनकी कर्म भूमि थी. वे उच्चकोटि के विद्वान थे. उनकी विद्वता के कारण ही उन्हें विद्यासागर की उपाधि दी गई थी. वे नारी शिक्षा के समर्थक थे. उनके प्रयास से ही कलकत्ता एवं अन्य स्थानों पर बालिका विद्यालयों की स्थापना हुई. उन्होनें विधवा पुनर्विवाह के लिए लोगमत तैयार किया. उन्हीं के प्रयासों से 1856 ई. में विधवा-पुनर्विवाह कानून पारित हुआ. उन्होंने अपने इकलौते पुत्र का विवाह एक विधवा से ही किया. उन्होंने बाल विवाह का भी विरोध किया.
विद्यासागर एक दार्शनिक, शिक्षाशास्त्री, लेखक, अनुवादक, मुद्रक, प्रकाशक, उद्यमी, सुधारक एवं मानवतावादी व्यक्ति थे. बांग्ला भाषा के गद्य को सरल एवं आधुनिक बनाने का उनका कार्य सदा याद किया जायेगा. उन्होने बांग्ला लिपि के वर्णमाला को भी सरल एवं तर्कसम्मत बनाया. बंगला पढ़ाने के लिए उन्होंने सैकड़ों विद्यालय स्थापित किए और रात्रि पाठशालाओं की भी व्यवस्था की. उन्होंने संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए प्रयास किया. संस्कृत कॉलेज में पाश्चात्य चिंतन का अध्ययन भी विद्यासागर की ही देन है. 





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