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स्कूल, कॉलेज और मॉल को खोलने का निर्णय लेना एक आत्मघाती फैसला

N7News Admin 31-05-2020 04:44 PM विशेष ख़बर

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सरकारी फैसले के अनुसार सरकारी स्कूल अभी बंद रहेंगे,लेकिन कोचिंग संस्था और प्राइवेट स्कूल में क्या होगा। 


Nitin piryadarshi Written By: डॉ. नीतीश प्रियदर्शी

रांची। 

लॉक डाउन में ज्यादा छूट देने से कोरोना का कम्युनिटी ट्रांसमिशन का खतरा अब बढ़ गया है। अभी ही ज्यादा खतरे का समय है। अगर जून से स्कूल और कॉलेज को खोलने का निर्णय लिया गया तो ये आत्मघाती फैसला होगा। स्कूल और कॉलेज प्रशासन को इस पर गंभीरता से सोचना होगा। क्योंकि बहुत से बच्चे की ट्रैवल हिस्ट्री का पता नहीं होगा वो कोरोना के वाहक भी हो सकते हैं। वो स्कूल बसों में या फिर पब्लिक ट्रांसपोर्ट में सट के बैठेंगे तो इस वायरस के चपटे में आयंगे जिससे दूसरे स्वस्थ बच्चों में भी वायरस तेज़ी से फैलेगा।

अगर स्कूल के बच्चे, शिक्षक या शिक्षिकाओं को कोरोना होता है तो क्या स्कूल जिम्मेवारी लेगा?

स्कूल अपने शिक्षकों को बुला के बहुत बड़ा खतरा ले रहा है। मात्र स्कूल-कॉलेज ही नहीं जाना है उसके पहले की स्थिति को भी समझना है। बच्चों का बस स्टॉप पर दूसरे बच्चों के साथ खड़ा होना भी एक खतरे की स्थिति है। जो बच्चे अगर टेम्पो से जायेंगे तो उनके साथ दूसरे यात्री भी होंगे। हर बार टेम्पो को या फिर स्कूल बस को सैनीटाइज़ करना भी मुश्किल होगा। स्कूल के शिक्षक भी प्रभावित होंगे क्योंकि बहुत से शिक्षक सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करते है। उनके बारे में भी सोचना होगा। स्कूल कॉलेज खोलने से ये तय है कि कोरोना तेज़ी से फैलेगा और स्थिति संभाल के बाहर हो जाएगी। हर घर, मोहल्ला , शहर और गांव इस बीमारी से ग्रसित होंगे। हमारी स्थिति अमेरिका, स्पेन, इटली, और ब्राज़ील जैसे देशों जैसी हो जायेगी।

रही बात मॉल खोलने की तो ये फैसला समझ के बाहर है। अभी ज्यादा जरुरी है खाने के सामान की छोटो-छोटी दुकानों को खोलना न की बड़े-बड़े मॉल को। मॉल खुलने से भीड़ बढ़ेगी और कोरोना से कई लोगों को एक साथ संक्रमित होने का खतरा बढ़ जायेगा। उस भीड़ में कितने लोग इस वायरस के वाहक होंगे नहीं पता। इस बीमारी को हलके में न लें नहीं तो कोरोना का पीक आने से कोई नहीं रोक सकता। हमारे यहाँ इस वायरस से लड़ने के लिए अस्पतालों की संख्या भी बहुत कम है। अभी जब ज्यादा रिपोर्ट आने लगी है तो इस लॉक डाउन में विशेष सतर्कता की जरुरत है क्योंकि इसमें ज्यादा छूट दी जा रही है।

लेखक-डॉ. नीतीश प्रियदर्शी ,पर्यावरणविद एवं  असिस्टेंट प्रोफेसर भूगर्भ विज्ञान विभाग, रांची विश्वविद्यालय। ये लेखक के निजी विचार हैं। 




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