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स्व-नियमन फेल हुआ मीडिया के भांडपन से! लेकिन क्या समाज को स्वयं अपनी समस्या में दिलचस्पी है?

N7News Admin 19-09-2020 10:00 AM Opinion

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N k singh N.K Singh

मात्र स्व-नियमन संभव था पर वह भी भारत में फेल हो गया 

इस सप्ताह सुप्रीम कोर्ट हीं नहीं कम से कम देश के दो उच्च न्यायलय मीडिया में ख़बरों (?) के गिरते स्तर को लेकर चिंतित रहे. सुप्रीम कोर्ट ने एक कार्यक्रम को राष्ट्र के लिए अहित करने वाला बता कर रोका तो बॉम्बे हाई कोर्ट ने टीवी चैनलों के “सुशांत-रिया” तोतारटंत पर सरकार से जवाब माँगा. 

दिल्ली-स्थित एक चैनल का कार्यक्रम न केवल एक समुदाय-विशेष को “यूपीएससी जेहादी” बताने वाला था बल्कि उस समुदाय के सभी सिविल सेवा में उत्तीर्ण हो कर आये अफसरों को भी इसी ब्रश से रंगने वाला था. इस कार्यक्रम को प्रसारित करने के सरकार के आदेश का पर सरकारी वकील (एसजी)  का तर्क हास्यास्पद होने की हद तक भौंडा था. उनका कहना था “यह एक खोजी पत्रकारिता है और पत्रकारों के आज़ादी सर्वोपरि है”. सरकार शायद भूल गयी कि जब उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर जिले में एक पत्रकार ने बच्चों को मध्याह्न भोजन के नाम पर रोटी-नमक खिलाये जाने की खबर दी तो उस पर जिले के अधिकारियों ने मुकदमा कर दिया. दिल्ली दरबार के नाक के नीचे नॉएडा में कोरोना काल में जिन पत्रकारों ने क्वारंटाइन में भोजन न मिलने और अन्य सुविधाओं के अभाव की खबर दिखाई तो उसे प्रशासन ने जेल भेजने की धमकी दी. इस कार्यक्रम में कहा गया था कि सिविल सेवा में मुसलमानों को ३५ साल की आयु और छः प्रयास की छूट है जबकि हिन्दुओं को ३२ साल और चार प्रयास हीं मिलते हैं. यह एकदम गलत तथ्य हैं जिस पर कोर्ट ने नाराजगी जाहिर की. शीर्ष कोर्ट का अपनी टिप्पणी में कहना था “यह कार्यक्रम खतरनाक, किसी समुदाय को कलंकित करने वाला, कपटतापूर्ण और धार्मिक –कट्टरता से ओतप्रोत है और राष्ट्र का अहित करने वाला है. यूपीएससी के ताज़ा रिकॉर्ड के अनुसार केवल ४.२ प्रतिशत मुसलमान हीं इस सेवा में पास हुए जबकि आबादी में उनकी हिस्सेदारी १४.२ प्रतिशत है. फिर अगर किसी समुदाय के लोग अपने बच्चों को देश की सबसे कठिन परीक्षा में उत्तीर्ण करा लेते हैं तो यह अन्य समुदायों के लिए सीखने की बात है या उन्हें “जेहादी” करार देने की. 

घटिया कार्यक्रम पसंद, पर मीडिया से नाराजगी 

अक्सर समाज के आमो-खास से आवाज उठती है—इस घटिया मीडिया पर नियंत्रण जरूरी हो गया है. ताज्जुब तो तब होता है जब ऐसी हीं ध्वनि मीडिया की कुछ संस्थाएं और उनमें के कुछ लोग उठाते है. इसके दो कारण होते हैं ---या तो वे संविधान, एक संस्था के रूप में मीडिया की प्रकृति और शासक-वर्ग का चरित्र नहीं जानते या वे यह सिद्ध करना चाहते हैं कि मीडिया में रह कर चूंकि हम “घटिया मीडिया” के खिलाफ मुद्दा उठा रहे हैं लिहाज़ा हम तो स्वयं-सिद्ध पाक-साफ़ हैं. लेकिन कुछ मीडिया का वर्ग गंभीरता से इसमें सुधार चाहता है –नियमन के जरिये.  

नियमन के लिए नियम बनाना होता है. मीडिया के लिए भी नियमन करने वाली संस्था होनी चाहिए और कुछ नियम होने चाहिए जिनका अनुपालन न करने पर नियामक संस्था सजा देने का अधिकार रखे.

नियमन की यह संस्था कौन बनाएगा?

क्या सरकार?

तो फिर संविधान में दी गयी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता १९(१) (अ) का क्या होगा? और  क्या अनुच्छेद १९(२) में दिए गए आठ युक्तियुक्त निर्बंध (रिज़नेबल रेस्ट्रिक्शन) और उनसे शक्ति हासिल कर राज्य द्वारा मीडिया पर अंकुश के लिए बनाये गए लगभग ३८ कानून काफी नहीं हैं?

फिर संविधान निर्माताओं ने अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य मीडिया के लिए कोई अलग से नहीं दी है यह सभी नागरिकों को उपलब्ध है. मीडिया याने औपचारिक मीडिया याने न्यूज़ चैनल और अखबार को यह अलग से नहीं मिली है. तात्पर्य यह कि नियमन की वकालत करने वाले धयान रखें कि जिस दिन इस औपचारिक मीडिया पर किसी भी किस्म का बाहरी नियन्त्रण हुआ उस दिन सामान्यजन से लेकर विपक्ष की आवाज भी बंद हो जायेगी क्योंकि कलक्टर को वे अधिकार होंगें जो प्रजातन्त्र को ऑक्सीजन देने वाली नली को काट देंगें. फिर इसका एक और पहलू है. सोशल मीडिया के ज़माने में हर “नेट-यूजर” पत्रकार बन गया है और वह अद्वैतवाद से अवमूल्यन तक हर विषय पर अपने ज्ञानानुसार तर्क-कुतर्क के जरिये झूठ-सच परोस रहा है. अगर सुशांत-रिया सोशल मीडिया पर ट्रेंड हो रहा है और लाखों-करोड़ों लोग उसे “लाइक-डिसलाइक” कर रहे हैं तो गलती किसकी है ? खबरिया चैनल का एक छोटा सा वर्ग हीं नहीं, सोशल मीडिया की कुछ साइट्स भी किसानों की समस्या को लेकर, बाढ़ की विभीषिका झेलते ग्रामीणों के मुद्दे पर, देश में विकराल रूप लिए बेरोजगारी पर बहुत कुछ दिखा रही हैं।

लेकिन क्या समाज को स्वयं अपनी समस्या में दिलचस्पी है?

रिया और फ़िल्मी दुनिया में ड्रग्स की लत उसे अपनी पेट की आग से ज्यादा अहम लगती है. तभी तो सुशांत-रिया-ड्रग्स दिखने में घिनौनेपन की सारी हदें पार करने वाला चैनल टीआरपी में कुलांचे भरता निकला जाता है और बाकि चैनल उसी के नक़्शे कदम पर चलने लगते हैं.

लोगों को क्या बेरोजगारी की विकरालता दिखने वाला चैनल नहीं दिखता? 

समाज में एक छोटे लेकिन गंभीर वर्ग का (सबका रहता तो बेहूदा चैनलों की टीआरपी न बढ़ती) ऐतराज किस बात को लेकर है? यही न कि अधिकाँश चैनल दिन-रात सुशांत, कंगना, और आगे आने वाले आठ-नौ महीने बाद अनुष्का की डिलीवरी की खबर दिखाएंगें. जरा सोचिये किस कानून से कोई नियामक संस्था किसी चैनल को कह सकती है कि वे सुशांत की आत्महत्या पर कितने दिन स्टूडियो डिस्कशन करें, कितना चीखें और किस गेस्ट से क्या सवाल पूछें? क्या एक एडिटर को बाध्य किया जा सकता है कि वह अपने रिपोर्टरों की टीम और ओबी वैन टीम बांद्रा या जुहू में “किस हेरोइन का किस हीरो से “क्या चल रहा है” प्रोग्राम के अंतर्गत साथ-साथ रेस्तरां से निकलना दिखाने में लगाये या कोलाबा में बिहारी मजदूरों की समस्या दिखाने में.   

कैसे भांड बने खबरिया चैनल वाले

बहरहाल यह हमारा कुतर्क होगा कि हम कहें कि “वे देखते हैं तो हम दिखाते हैं”. यह तर्क भांड देते हैं अपनी कमर को भौंडे कामुक ढंग से हिलाने के औचित्य के रूप में. 

अगर देश का जीडीपी विकास-दर बढ़ गया है तो गोदी मीडिया “मोदी-भक्ति” के डेलिरियम में चीखने लगेगा क्योंकि उसे यह नहीं मालूम कि मानव विकास सूचकांक (जो विकास का असली पैमाना है) क्या होता है. अगर इस पैमाने पर भारत गिर भी जाये तो शाहरुख़ –सलमान अनबन से काम चला लेंगें. अगर नवम्बर-दिसम्बर माह में डीएपी खाद का संकट है तो लाखों रुपये महीने की पगार पाने वाले इन एडिटरों के यह बात सिर के ऊपर से निकल जायेगी कि किसानों का क्या हश्र होगा. आसान है एडिटर के लिए कि रिपोर्टर को किसी एक्ट्रेस के घर के सामने भेज कर ओबी लगा कर तीन घंटें समाज को बताता रहे कि “आजकल किस एक्टर से चल रहा है”. इसमें बीच-बीच में “मुन्नी कैसे बदनाम हुई” का ठुमका दिखा कर एक ओर टीआरपी लूटा जा सकता है और दूसरी ओर आम दर्शक की सोच को और जडवत किया जा सकता है. कोई आंकड़ा जानने या संविधान पढने की जरूरत हीं नहीं है. ये या इनका मालिक राज्यसभा की सदस्यता या उच्च नागरिक अवार्ड को जीवन की सार्थकता समझते हैं लिहाज़ा मोदी में इन्हें “रब” दिखता है. छः साल पहले दूसरा धड़ा हिन्दुओं को गरिया कर आत्मतोष से लबरेज हो जाता था।

स्व-नियमन फेल हुआ मीडिया के भांडपन से ? 

सन २००७ में जब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का एक वर्ग “एलियन को धरती पर दिखाने लगा” याने भारतीय न्यूज़ चैनल फिसलन की सबसे नीचले सोपान पर था और जनाक्रोश अपनी चरम पर तो कुछ संपादकों ने बैठकर एक स्व-नियमन संस्था बनाई. लगभग उसी समय मालिक-सीईओ ने भी एक संस्था बनाई. संपादक अपनी मोटी  तनख्वाह की वजह से मालिक-सीईओ के रहमो-करम पर रहने लगा और पहली संस्था लगभग कहीं कोने में अंतिम साँसे ले रही है. मालिको वाली संस्था चूंकि बैलेंसशीट के हिसाब से जर्नलिज्म को देखती है लिहाज़ा टीआरपी से नज़रें हटा नहीं सकी. एडिटर्स में क्षमता हो सकती थी कि जन-अभिरुचि की जनसरोकार की ओर मोड़ें लेकिन उनमें पत्रकारिता की वो समझ जाती रही. मार्किट फोर्सेज और मालिकों ने सुनिश्चित किया किया “असली और नैतिक रूप से मजबूत” पत्रकार बाज़ार से बाहर हो जाएँ क्योंकि इनके जरिये याने जनसरोकार की पत्रकारिता करके टीआरपी लाना और विज्ञापनदाताओं को लुभाना खर्चीला धंधा था. 

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई जारी है और संभव है मीडिया के घटिया स्वरुप पर शायद उसका फैसला कोई प्लास्टिक सर्जरी कर सके.   

लेखक एन. के. सिंह देश के जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार व ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के पूर्व महासचिव हैं. ये लेखक के निजी विचार हैं)




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